हिन्दी उपन्यास में विस्थापन : आंचलिकता, अस्मिता और विकासजनित संकट

Authors

  • डॉ. अंशुमान सिंह हिन्दी विभाग, बयालसी पी.जी. कॉलेज, जलालपुर जौनपुर, इंडिया
  • नितीश सिंह हिन्दी विभाग, बयालसी पी.जी. कॉलेज, जलालपुर जौनपुर, इंडिया

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v4i2.528

Keywords:

विस्थापन, विकासजनित विस्थापन, आंचलिकता, आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक विघटन, भूमि-अधिकार, आजीविका, पुनर्वास, आधुनिकता, सामाजिक न्याय

Abstract

विस्थापन केवल किसी व्यक्ति या समुदाय के भौगोलिक स्थान परिवर्तन की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह भूमि, आजीविका, सामाजिक संबंधों, सांस्कृतिक स्मृतियों, सामुदायिक पहचान और मनोवैज्ञानिक सुरक्षा के विघटन से जुड़ी बहुआयामी सामाजिक प्रक्रिया है। हिन्दी उपन्यास ने समय-समय पर इस अनुभव को व्यापक मानवीय और सामाजिक संदर्भों में अभिव्यक्त किया है। विशेष रूप से आंचलिक और आधुनिक हिन्दी उपन्यासों में विस्थापन का संबंध ग्रामीण जीवन, आदिवासी समाज, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, विकास परियोजनाओं, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानता से जुड़ता दिखाई देता है। प्रस्तुत अध्ययन में हिन्दी उपन्यासों में विस्थापन की अभिव्यक्ति को आंचलिक चेतना, जनपदीय जीवन, आधुनिकता, अस्मिता-संकट और विकासजनित सामाजिक विघटन के संदर्भ में समझने का प्रयास किया गया है। अध्ययन में यह स्पष्ट होता है कि आंचलिक उपन्यास में भूगोल केवल कथा की पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि सामुदायिक जीवन और सांस्कृतिक पहचान का सक्रिय आधार बन जाता है। रेणु, राही मासूम रज़ा और श्रीलाल शुक्ल की रचनाओं से विकसित आंचलिक चेतना आगे चलकर आदिवासी और हाशिये के समुदायों के विस्थापन, संसाधनों पर अधिकार तथा सांस्कृतिक अस्तित्व के प्रश्नों से जुड़ती है। विकास परियोजनाओं से होने वाला विस्थापन भूमि-विहीनता, रोजगार-विहीनता, आवास-विहीनता, हाशियाकरण, खाद्य असुरक्षा तथा सामुदायिक विघटन जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। इस दृष्टि से हिन्दी उपन्यास विस्थापित समुदायों के अनुभवों को केवल करुणा के स्तर पर नहीं, बल्कि सत्ता, विकास और सामाजिक न्याय के प्रश्नों के रूप में भी प्रस्तुत करता है।

References

रेणु, फ. (1954). मैला आँचल. राजकमल प्रकाशन.

रज़ा, रा. मा. (1966). आधा गाँव. राजकमल प्रकाशन.

शुक्ल, श्री. (1968). राग दरबारी. राजकमल प्रकाशन.

राकेश, मो. (1961). अंधेरे बंद कमरे. राजकमल प्रकाशन.

सोबती, कृ. (1967). मित्रो मरजानी. राजकमल प्रकाशन.

भंडारी, म. (1979). महाभोज. राधाकृष्ण प्रकाशन.

Downloads

Published

2026-09-13

How to Cite

सिंह अंशुमान, & सिंह नितीश. (2026). हिन्दी उपन्यास में विस्थापन : आंचलिकता, अस्मिता और विकासजनित संकट. International Journal of Science and Social Science Research, 4(2), 154-159. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v4i2.528

Similar Articles

61-70 of 74

You may also start an advanced similarity search for this article.