भरमौर क्षेत्र के सुप्रसिद्ध ‘पौणमाता’ वादक श्री मुसाफिर राम भारद्वाज की लोक संगीत में भूमिका
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v2i2.213Keywords:
संस्कृति, संगीत,, राम भारद्वाजAbstract
लोक संगीत जीवन की आत्मा है जो किसी भी प्रान्त की संस्कृति पर आधारित होता है। विभिन्न प्रान्तों में प्रादेशिक संस्कृति की आवश्यकता के अनुसार भिन्न-भिन्न अवसरों पर जो गीत गाए जाते हैं, उन्हें लोक संगीत कहते हैं। लोक संगीत एक गौरवपूर्ण पृष्ठभूमि है। इसकी सुविकसित अवस्था के कारण ही लोक संगीत अन्य विधाओं का विकास माना जाता है। भारत का संगीत इतना व्यापक है कि हर पहलू को बता पाना कठिन है क्योंकि हर क्षेत्र व उस क्षेत्र के भी उपक्षेत्र का अपना एक अलग संगीत है जिसका संगीत की दृष्टि से अलग महत्त्व है।
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