भारतीय संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i1.374Keywords:
संस्कृति, अधिकार, एकीकृत माध्यमिक शिक्षा, भारतीय, मनुष्य एवं शैक्षिक अधिकारAbstract
प्राचीन काल से ही भारत में शिक्षा मोक्ष प्राप्ति, विश्व शांति, मानव का सर्वांगीण विकास, मानव की नैतिक एवं चारित्रिक उन्नति, सभ्यता एवं संस्कृति का विकास आदि पर प्रमुखता से बल देती है। वास्तव में मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, मनुष्य सदैव ही अपने ज्ञान, बुद्धि एवं विवेक से अपने चारों तरफ की परिस्थितियों का निरंतर निरीक्षण करता रहता है और उसमें निरंतर सुधार के लिए प्रयत्नशील रहता है, जिसके लिए वह निरंतर अपने जीवन पद्धति, रीति रिवाज, रहन-सहन, आचार-विचार के साथ-साथ विभिन्न अविष्कारों और अनुसंधानों के द्वारा स्वयं को एक जंगली पशु से सभ्य मनुष्य बनाने का प्रयास भी करता है साथ ही साथ अपने सांस्कृतिक विकास और उन्नति के लिए भी प्रयत्नशील रहता है।
संस्कृति और शिक्षा एक दूसरे से घनिष्ठ रूप से संबंधित रहते हैं, यदि शिक्षा किसी समाज की संस्कृति को आकार देती है तो संस्कृति भी शिक्षा को एक दिशा प्रदान करती है। संस्कृति शिक्षा के लिए सामग्री और प्रेरणा प्रदान करने के लिए नेतृत्व करती है तो शिक्षा भी संस्कृति को संरक्षित एवं समृद्ध करती है तथा एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तांतरित करने के लिए वचनबद्ध रहती है। सांस्कृतिक और शैक्षिक अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं कि मनुष्य को कला, शिक्षा, ज्ञान, चरित्र, व्यवहार, विज्ञान, अनुसंधान और अन्य सांस्कृतिक अनुभव तक पहुँच प्राप्त हो। भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों में सम्मिलित अनुच्छेद 29 एवं 30 भारत देश के नागरिकों को शिक्षा एवं संस्कृति संबंधी अधिकार प्रदान करता है, जो की अपनी शिक्षा, संस्कृति, भाषा एवं लिपि आदि को बनाए रखने तथा उससे संबंधित संस्थाओं और उनके प्रशासन का अधिकार सुनिश्चित करता है। यह अनुच्छेद विशेष रूप से अल्पसंख्यकों की संस्कृति एवं शिक्षा को सुरक्षित करने पर मुख्य रूप से बल देता है। सांस्कृतिक एवं शैक्षिक अधिकार व्यक्ति के समग्र विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। साथ ही साथ यह दूसरों के अधिकारों एवं दूसरों की संस्कृतियों को समझने में भी अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।
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