विवाहिता व अविवाहिता छात्राध्यापकों के संवेगात्मक बुद्धि का अध्ययन
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i4.606Keywords:
संवेगात्मक बुद्धि, मध्यमान, मानक विचलन, मानक त्रुटि, CR मूल्यAbstract
शिक्षा के वास्तविक और व्यापक अर्थ में उसके उद्देश्य भी बहुत व्यापक और बहुआयमी है जो शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास के साथ-साथ नैतिक, चारित्रक, व्यावसायिक तथा आध्यामिक विकास तक विस्तीर्म है। इस स्थिति में शिक्षा के सभी रुपों औपचारिक, अनौपचारिक तथा निरौपचारिक के द्वारा उसका प्रमुख उद्देश्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास ही होना चाहिए। शिक्षा ही वस्तुतः किसी राष्ट्र की प्रगति का मानदण्ड है। कोई भी राष्ट्र अपने दक्ष मानवीय संसाधनों द्वारा समूह बनता है। शिक्षा व्यक्ति के सामाजिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग है जो उसे अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति में सहायता करती है। शिक्षा मानव सभ्यता की सर्वाधिक मूल्यवान धरोहर है। समस्त विश्व को एक सूत्र में पिरोने तथा मनुष्य और मनुष्य के बीच सद्भाव की स्थापना में शिक्षा की बड़ी-बड़ी भूमिका है जिसे नकारा नहीं जा सकता है। किसी भी क्रिया की तरह शिक्षा भी तथा व्यवहार दोनों का संश्लेस है। वास्ताविक अनुभवों की प्रक्रिया में हमारे सम्मुख अनेक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। इनके समाधान का पहला पक्ष होता है इस पर विचार करना तथा दूसरा पक्ष है उपयुक्त सिद्धान्तों का निर्माण करना। शिक्षा के विभिन्न पक्षों का तादात्म्य जीवन के इन्हीं आधारभूत प्रश्नों के समाधान खोजने का प्रयत्न करता है।
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