नागार्जुन के उपन्यासों में जनवादी चेतना के रूपक
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v2i2.122Keywords:
नागार्जुन, बाबा बटेश्वर नाथ, उपन्यासAbstract
नागार्जुन हिंदी साहित्य के एक प्रमुख जनवादी उपन्यासकार हैं। उनके उपन्यासों में हमें जनवादी चेतना के विविध पक्षों का निदर्शन होता है। शोषित,वंचित दलित और उत्पीड़ित वर्ग की पीड़ा का सहज निदर्शन कराती उनकी रचनाएँ पाठकों के हृदय पर अमिट प्रभाव छोड़ती हैं। कृषक,मजदूर, दलित और स्त्री की पीड़ा उनकी औपन्यासिक रचनाओं में आधोपान्त दिखाई देती है। नागार्जुन के जनवादी लेखन में सामाजिक जागरण के साथ ही राजनीतिक जागरण का भाव भी निहित है। सामाजिक और आर्थिक विषमता का चित्रण करते हुए नागार्जुन अत्यंत संवेदनशील और मुखर हो उठते है। उनके उपन्यासों में पूँजीवाद की विसंगति और विडम्बना, सामाजिक क्षरण, निम्नवर्ग की दयनीय स्थिति,पारिवाारिक विघटन, सांस्कृतिक मूल्यहीनता इत्यादि का व्यापक चित्रण है। आम आदमी का त्रासद जीवन, अभाव और अपमान से पीड़ित मजदूर और स्त्री , मोहभंग से पीड़ित आम मानस की दारूण कथा का नागार्जुन ने विद्रोही स्वर प्रदान किया है।
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