विधि और न्याय का समकालीन विश्लेषण ”न्याय कभी भी दिया नहीं जाता है, यह एक ऐसा कार्य है जिसे हमेशा प्राप्त करना होता है।” फ्रेडरिक ऐंजल
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https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i3.58Keywords:
राज्य, दण्ड, समानता, सुरक्षा, स्वतन्त्रता, नैतिकता, धर्म, सापेक्षता, गन्त्यात्मक, समाजAbstract
विधि और न्याय दो समान किन्तु भिन्न अवधारणाओं को सन्दर्भित करने वाले शब्द हैं। यह दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। न्याय वह साध्य (लक्ष्य) है जिसे विधि रूपी साधन से प्राप्त करने का प्रयास किया जाता है। यह भी सही है कि दोनों भिन्न-भिन्न समयों पर विधिक-व्यवस्था का अंग बने हैं। न्याय की संकल्पना सबसे प्राचीन है। मनुष्य जब से धरती पर आया है, वह न्याय की अपेक्षा करता रहा है। न्याय एक ऐसा शब्द है, जिसकी कई परिभाषायें की जा सकती हैं। इसे किसी निश्चित दायरे में नहीं बाँधा जा सकता है। न्याय अधिकारों की समानता और निष्पक्षता के विचार पर आधारित एक अमूर्त अवधारणा है। वहीं आधुनिक राज्यों की संकल्पना मध्यकाल की उपज मानी जाती है और इन्हीं राज्यों के प्रादुर्भाव के बाद विधि का वर्तमान स्वरूप अस्तित्व में आया। विधि किसी देश की सरकार द्वारा नागरिकों के जीवन और कार्यो को विनियमित करने के लिए बनायें गये नियमों, मानकों, सिद्धांतों और मानदंडों की एक प्रणाली है। प्रारम्भिक समाजों में तो विधि और न्याय को अलग-अलग किया जा सकता था किन्तु आधुनिक शासन-व्यवस्था में यह संभव नहीं है। आज विधि मानव-जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में प्रवेश कर गयी है। ऐसे में यदि विधि में न्याय का तत्व मौजूद नहीं होगा तो लोग उस विधि को मानने से इंकार कर सकते हैं जो किसी भी विधिक व्यवस्था के लिए घातक हो सकता है। अतः विधिक व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करने के लिए यह आवश्यक है कि सभी विधियाॅ न्याय की संकल्पना को आगे बढ़ाने वाली होनी चाहिए।
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