शिक्षा-दर्शन एवं पाठ्यक्रम: श्री अरविन्द घोष एवं एनी बेसेण्ट के सन्दर्भ में

Authors

  • अतुल कुमार श्रीवास्तव असिस्टेंट प्रोफेसर, शिक्षाशास्त्र विभाग, राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i4.415

Keywords:

श्री अरविन्द, संपूर्ण शिक्षा, सत्य, आत्मा और धर्म, चरित्र निर्माण, बौद्धिक, मानसिक, शारीरिक विकास, शिक्षा का उद्देश्य

Abstract

श्री अरविन्द के अनुसार शिक्षा केवल जानकारी का संप्रेषण नहीं है, बल्कि यह मानव की आत्मा, चरित्र और चेतना के विकास की प्रक्रिया है। वे शिक्षा को एक साधना मानते हैं जिसका उद्देश्य मनुष्य के भीतर छिपी दिव्यता को जाग्रत करना है। उनके विचारों में शिक्षा का मूल आधार चार तत्वों पर आधारित हैः विवेक (discernment), सदाचार (virtue), शुद्धता (purity), और सत्य के प्रति समर्पण।
श्री अरविन्द के अनुसार, शिक्षा का उद्देश्य केवल व्यावसायिक दक्षता नहीं बल्कि आत्मा और राष्ट्र की चेतना का निर्माण होना चाहिए। उन्होंने चरित्र निर्माण, आत्म-ज्ञान, सत्य की खोज, और मन, शरीर, हृदय और आत्मा के समन्वित विकास पर बल दिया।
उनके मतानुसार बालक का विकास उसकी प्राकृतिक प्रवृत्तियों के अनुसार होना चाहिए और शिक्षक को एक मार्गदर्शक बनना चाहिए, न कि थोपने वाला। उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि वह केवल बाह्य और तकनीकी ज्ञान देती है, जबकि शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए आंतरिक विकास।
इसके अतिरिक्त, लेख में श्री अरविन्द की संस्थाओं, शिक्षा पद्धति, और शिक्षा के विभिन्न स्तरों जैसे प्राथमिक, माध्यमिक, और उच्च शिक्षा पर उनके दृष्टिकोण का भी विस्तार से वर्णन किया गया है। उन्होंने शिक्षा में नैतिक, धार्मिक, बौद्धिक और शारीरिक संतुलन की आवश्यकता पर बल दिया।

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Published

2024-03-31

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Articles