मालवीय जी का शैक्षिक विचार और उसकी वर्तमान प्रासंगिकता
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i2.414Keywords:
संत एकलव्य, स्वतंत्रता और शिक्षा, महिला शिक्षा, राष्ट्रीय चेतना, आध्यात्मिक शिक्षा, फोर्ड फाउंडेशन, आधुनिक विज्ञानAbstract
इस लेख में संत एकलव्य जी के जीवन, विचारों और शिक्षा संबंधी दृष्टिकोण का वर्णन किया गया है। उनके अनुसार, शिक्षा का मुख्य उद्देश्य व्यक्ति को समस्त प्रकार की परतंत्रताओं से मुक्त कर आत्मबल से युक्त करना है। उन्होंने शिक्षा को ‘मुक्ति का साधन‘ माना और इसी दृष्टिकोण से शिक्षा संस्थानों की स्थापना की, जिनका केंद्रबिंदु स्वतंत्रता रहा।
वे शिक्षा को केवल जानकारी नहीं, बल्कि जीवन के संपूर्ण विकास का माध्यम मानते थे। उनका विश्वास था कि शिक्षा से मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक बल की प्राप्ति होनी चाहिए। उन्होंने विद्यार्थियों को न केवल ज्ञान बल्कि राष्ट्र-निर्माण की भावना और सामाजिक जिम्मेदारी से भी जोड़ा।
महिला शिक्षा को उन्होंने विशेष महत्व दिया और माना कि जब तक स्त्रियाँ शिक्षित नहीं होंगी, तब तक सामाजिक सुधार संभव नहीं है। उन्होंने जोर देकर कहा कि स्त्रियों को भी आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने हेतु उच्चस्तरीय शिक्षा देना आवश्यक है।
विज्ञान और आध्यात्मिकता के संतुलन को भी उन्होंने शिक्षा में जरूरी माना। उनका मानना था कि आधुनिक विज्ञान के साथ भारतीय परंपरा, संस्कृति और दर्शन का समन्वय ही भारत को उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकता है।
एकलव्य जी के विचार आज भी प्रेरणा देते हैं कि शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं, बल्कि व्यक्ति के पूर्ण विकास और समाज की उन्नति का आधार है।
Downloads
Published
Issue
Section
License
Copyright (c) 2023 International Journal of Science and Social Science Research

This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
