शीर्षक-अन्य पिछड़ा वर्ग की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर अध्ययन

Authors

  • ओमप्रकाश दूबे असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, राजा श्रीकृष्ण दत्त स्नातकोत्तर महाविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश, भारत

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i4.412

Keywords:

अन्य पिछड़ा वर्ग, सामाजिक पिछड़ापन, शैक्षणिक पिछड़ापन, आर्थिक पिछड़ापन, जाति व्यवस्था, आरक्षण, मंडल आयोग

Abstract

यह अध्ययन अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की सामाजिक आर्थिक स्थिति पर केंद्रित है। यह पिछड़ेपन के निर्धारण के लिए स्थापित किए गए विभिन्न मानदण्डों की जांच करता है। भारतीय समाज में जाति व्यवस्था एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो जन्मजात और संस्तरण पर आधारित है। प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (कालेलकर आयोग) ने सामाजिक पिछड़ेपन के निर्धारण में जाति की प्रासंगिकता को स्वीकार किया। उच्चतम न्यायालय के निर्णयों ने भी अनुच्छेद 15 (4) के तहत पिछड़े वर्गों की पहचान में जाति को एक संगत साधन माना है, लेकिन यह भी स्पष्ट किया है कि वर्गीकरण केवल जाति पर आधारित नहीं हो सकता। मंडल आयोग (द्वितीय राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग) ने माना कि सामाजिक पिछड़ापन परम्परागत भारतीय समाज में ’जाति’ स्थिति का सीधा परिणाम है। आयोग ने सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को निर्धारित करने के लिए ग्यारह ’सूचकों’ को वर्गीकृत किया, जिनमें सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक मानदण्ड शामिल हैं। अध्ययन में व्यवसाय/उपजीविका को भी पिछड़ापन निर्धारण में एक सहायक मापदण्ड के रूप में पहचाना गया है, विशेष रूप से उन व्यवसायों के संबंध में जिन्हें परम्परागत रूप से हीन माना जाता है। गरीबी या निर्धनता सामाजिक पिछड़ेपन से जुड़ी है, यद्यपि यह पिछड़ापन निर्धारण का एकमात्र आधार नहीं है, और कुछ स्रोतों का मानना है कि सामाजिक पिछड़ापन गरीबी का कारण बनता है न कि इसका विपरीत। निष्कर्षतः, स्रोतों के आधार पर, सामाजिक पिछड़ापन निर्धारण हेतु जाति एक महत्वपूर्ण कसौटी व मानदण्ड है।

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Published

2024-03-31

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Articles