अभिज्ञानशाकुन्तलम् के श्लोकचतुष्टय: एक विमर्श
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v2i2.375Keywords:
यास्यत्यद्य, पातुं न प्रथमं, अस्मान् साधु, शुश्रूषस्व गुरून्, विदाई, प्रकृति चित्रण, आदर्श संदेश, आदर्श शिक्षाAbstract
संस्कृत वाङ्मय में विद्वज्जनों के द्वारा उक्त यह सूक्ति सर्वाधिक प्रसिद्ध है- काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्या शकुन्तला। तत्रापि च चतुर्थोऽङ्कस्तत्र श्लोकचतुष्टयम्।। अर्थात् काव्यों में नाटक रमणीय होता है, नाटकों में अभिज्ञानशाकुन्तलम् रमणीय है, अभिज्ञानशाकुन्तलम् में भी चतुर्थ अंक रमणीय है और चतुर्थ अंक में भी चार श्लोक सर्वाधिक सुंदर हैं। अभिज्ञानशाकुन्तलम् के चतुर्थ अंक के चार श्लोक अपने भाव, कल्पना, कवित्व और अर्थोदात्तता के कारण अत्यन्त प्रसिद्ध हैं, और इनमें कहे गए उपदेशों के अनुकरण से आदर्श समाज स्थापित हो सकता है। वात्सल्य विप्रलम्भ एवं भाव-सौन्दर्य की दृष्टि से चार श्लोक अत्यन्त श्लाघनीय हैं।Downloads
Published
2024-08-30
Issue
Section
Articles
License
Copyright (c) 2024 International Journal of Science and Social Science Research

This work is licensed under a Creative Commons Attribution 4.0 International License.
How to Cite
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के श्लोकचतुष्टय: एक विमर्श. (2024). International Journal of Science and Social Science Research, 2(2), 338-341. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v2i2.375
