आयुर्वेद के ‘अष्टांग’ उपचार प्रविधि

Authors

  • पीयूष मणि त्रिपाठी शोधार्थी, काय चिकित्सा विभाग, आयुर्वेद संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
  • के.एच.एच.वी.एस.एस. नरसिम्हा मूर्ति पूर्व विभागाध्यक्ष, काय चिकित्सा विभाग, आयुर्वेद संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
  • रामानन्द तिवारी एसोसिएट प्रोफेसर, विकृति विज्ञान विभाग, आयुर्वेद संकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i2.439

Keywords:

भूतविद्या , वाजीकरण , कायचिकित्सा

Abstract

आयुर्वेद भारत का प्रमुख विश्वसनीय व प्रायोगिक तंत्र है। आयुर्वेद का रचनाकाल ईसा पूर्व 3000 से 50,000 वर्ष पहले यानि सृष्टि की उत्पत्ति के आस-पास या साथ का ही है।
आयुर्वेद के ऐतिहासिक ज्ञान के सन्दर्भ में सर्वप्रथम ज्ञान का उल्लेख, चरक मत के आत्रेय सम्प्रदाय के अनुसार मृत्युलोक में आयुर्वेद के अवतरण के साथ अग्निवेश का नामोल्लेख है। सर्वप्रथम ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। च्यवन ऋषि का कार्यकाल भी अश्विनी कुमारों का समकालीन माना गया है। आयुर्वेद के विकास में ऋषि च्यवन का अतिमहत्त्वपूर्ण योगदान है।
सुश्रुत के अनुसार काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के पास अन्य महर्षियों के साथ सुश्रुत जब आयुर्वेद का अध्ययन करने हेतु गये और उनसे निवेदन किया। उस समय भगवान धन्वंतरि ने उन लोगों को उपदेश देते हुए कहा कि ‘सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पादन पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक सहस्र अध्याय- शत सहस्र श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया।’

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Published

2025-07-31

How to Cite

आयुर्वेद के ‘अष्टांग’ उपचार प्रविधि. (2025). International Journal of Science and Social Science Research, 3(2), 58-68. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i2.439

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