प्राथमिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा की प्रासंगिकता

Authors

  • चन्द्र शेखर स्कालर, राजा श्री कृष्ण दत्त पीजी कॉलेज जौनपुर उत्तर प्रदेश, भारत

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i1.398

Keywords:

पर्यावरण शिक्षा, प्राथमिक शिक्षा, बालक का सर्वांगीण विकास, पर्यावरण संरक्षण, अनुभव आधारित शिक्षण

Abstract

लेख में प्राथमिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा की प्रासंगिकता पर विस्तृत चर्चा की गई है। भारतीय संस्कृति में पर्यावरण के प्रति आदर और संरक्षण की भावना वैदिक युग से ही विद्यमान रही है। वर्तमान समय में बढ़ते प्रदूषण, संसाधनों के दोहन और शहरीकरण ने पर्यावरण संतुलन को बिगाड़ दिया है, जिससे उसकी रक्षा के लिए जनचेतना और पर्यावरण शिक्षा अत्यंत आवश्यक हो गई है। बालक के विकास में वातावरण की महत्वपूर्ण भूमिका है, अतः प्राथमिक शिक्षा से ही पर्यावरण शिक्षा आरंभ की जानी चाहिए। इससे बच्चों में प्राकृतिक और सामाजिक परिवेश के प्रति जागरूकता, जिम्मेदारी और समझ विकसित होती है। लेख में बताया गया है कि किस प्रकार पर्यावरण शिक्षा बच्चों को तार्किक, बौद्धिक, सृजनात्मक और व्यवहारिक रूप से प्रशिक्षित करती है ताकि वे पर्यावरण संरक्षण में योगदान दे सकें। बुडवर्थ और विश्वकोश के उद्धरणों द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि पर्यावरण जीवन को हर स्तर पर प्रभावित करता है। प्राथमिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षण के उद्देश्य जैसे — प्रकृति के साथ संवाद, स्थानीय समस्याओं का हल, शैक्षिक भ्रमण और अनुभव आधारित शिक्षण को प्रमुखता दी गई है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 और एनसीएफ 2005 ने भी इसे शिक्षा में अनिवार्य रूप से सम्मिलित करने का सुझाव दिया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि प्राथमिक स्तर से ही पर्यावरण शिक्षा देना आवश्यक है ताकि भावी पीढ़ी प्रकृति के प्रति संवेदनशील और उत्तरदायी नागरिक बन सके।

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Published

2025-05-12

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प्राथमिक शिक्षा में पर्यावरण शिक्षा की प्रासंगिकता. (2025). International Journal of Science and Social Science Research, 3(1), 129-131. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i1.398

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