सुशीला टाकभौरे के कथा-साहित्य में स्त्री जीवन-चिंतन

Authors

  • संदीप असि० प्रो०, हिन्दी विभाग, गन्ना उत्पादक स्ना० महाविद्यालय, बहेड़ी (बरेली), मा० ज्यो० फुले रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय, बरेली (उ॰प्र॰), इंडिया

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v4i2.573

Keywords:

साहित्य, दलित, महिला, शोषण

Abstract

सुशीला टाकभौरे दलित हिन्दी साहित्य की एक सशक्त महिला हस्ताक्षर है। उनका समग्र लेखन जीवन के सरोकार परक चिंतन से युक्त है व उन्होंने नारियों पर होने वाले विभिन्न प्रकार के शोषण एवं अत्याचार आदि मुद्दों को अपने लेखन के केन्द्र में प्रमुख स्थान दिया है। महिलाओं के शारीरिक शोषण की घटनायें गाँव से लेकर शहर तक संगठित एवं असंगठित क्षेत्रों आदि हर जगह होती है। उनके द्वारा रचित प्रत्येक विधा चाहें वह उपन्यास हो, कहानी हो, नाटक हो या काव्य हो आदि में उन्होंने दलित स्त्री जीवन के विषय में उनका चिन्तन परिलक्षित होता है वे वर्णवादी व्यवस्था का उच्छेद् चाहते है और पारम्परिक, सामाजिक रूढ़ियों का भी विरोध करती है। वह दलित स्त्रियों के आत्मनिर्भरता को राजनीतिक विकास के लिए महत्वपूर्ण मानती है। वस्तुतः उनका लेखन दलित एकता का आख्यान है।

References

सुशीला टाकभौरेः स्त्री-जीवन संघर्ष, शारीरिक शोषण और कानून, मधुसूदन त्रिपाठी (सं), पृष्ठ-45, खुशी, प्रकाशन, नई दिल्ली, 2011

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वह लड़की, सुशीला टाकभौरे, पृष्ठ-70

चश्मा (नाटक), सुशीला टाकभौरे, पृष्ठ-98

मेरे लेखन का उद्देश्य...................... इण्टरव्यू, सुशीला टाकभौरे, 10 मई, 2022, Hindi.newsclick.in

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Published

2026-08-06