वैदिक साहित्य में सन्निहित कृषि प्रक्रिया की उपादेयता

Authors

  • त्रिपुर सुन्दरी संस्कृत विभाग डी.ए.वी.पी.जी.कालेज, वाराणसी

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i2.14

Keywords:

वैदिक साहित्य, कृषि, भारत

Abstract

वैदिक साहित्य में दीर्घदर्शी ऋषियों द्वारा सुचित्रित एवं सुनियन्त्रित जीवन पद्धति, स्थावर जङ्गमात्मक जगत् के आध्यात्मिक विषयों के अतिरिक्त कृषि, शिल्प तथा जीवन के अनेक वैज्ञानिक विषयों का ज्ञान उपलब्ध होता है। जीवधारियों की मूलभूत आवश्यकता “अन्न “की महत्ता को घोषित करते हुए श्रुति का कथन है—अन्नं वै प्राणाः ।अन्न प्राणियों का जीवनाधार है तथा अन्न का मूल कृषि है। यदि अन्न तथाकृषि के तात्विक अभिप्राय की व्याख्या की जाए तो कृषि सृष्टि का मूलाधार तथा अन्न सृष्टि के विकास का हेतु है। “अन्नंसाम्रात्यानामधिपतिः” तैत्तिरीयोपनिषद् के नवें अनुवाक में अन्न उत्पादन एवं महत्त्व को बताते हुए ऋषि कहते हैं

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Published

2023-09-30

How to Cite

वैदिक साहित्य में सन्निहित कृषि प्रक्रिया की उपादेयता. (2023). International Journal of Science and Social Science Research, 1(2), 41-46. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v1i2.14

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