मानसिक स्वास्थ्य: सम्प्रत्यय और भारतीय परिप्रेक्ष्य

Authors

  • रुपेश तिवारी असिस्टेंट प्रोफेसर (मनोविज्ञान), गाँधी शताब्दी स्मारक स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कोयलसा, आजमगढ़

DOI:

https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i3.508

Keywords:

मानसिक स्वास्थ्य, जैव–मनो–सामाजिक प्रारूप, भारतीय दृष्टिकोण, सामाजिक कलंक

Abstract

प्रस्तुत लेख में मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा के ऐतिहासिक विकास, उसके जैविक प्रारूप से जैव–मनो–सामाजिक प्रारूप तक की यात्रा तथा वर्तमान वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसकी स्थिति का विश्लेषण किया गया है। लेख यह स्पष्ट करता है कि प्रारम्भिक काल में मानसिक विकारों को दैवीय या बाह्य शक्तियों से जोड़कर देखा जाता था, किंतु वैज्ञानिक चेतना के विकास के साथ मानसिक स्वास्थ्य को शरीर की जैविक प्रक्रियाओं और रासायनिक संतुलन से जोड़ा गया। आधुनिक शोधों ने यह सिद्ध किया कि मानसिक स्वास्थ्य केवल जैविक कारकों तक सीमित न होकर मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और सांस्कृतिक कारकों की अंतःक्रिया का परिणाम है, जिसके फलस्वरूप “जैव–मनो–सामाजिक प्रारूप” व्यापक रूप से स्वीकृत हुआ। लेख में विश्व स्वास्थ्य संगठन की मानसिक स्वास्थ्य परिभाषा के माध्यम से यह रेखांकित किया गया है कि मानसिक स्वास्थ्य व्यक्ति की क्षमताओं, तनाव से निपटने की योग्यता, उत्पादकता और सामाजिक योगदान से जुड़ा हुआ है। भारतीय संदर्भ में प्राचीन ग्रंथों में वर्णित पंचकोश सिद्धांत और त्रिगुण सिद्धांत को आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए यह दिखाया गया है कि भारत में मानसिक स्वास्थ्य की अवधारणा प्राचीन काल से ही समग्र और बहुआयामी रही है। साथ ही, लेख वर्तमान भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों—जैसे सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी, संसाधनों और विशेषज्ञों की अल्पता—पर प्रकाश डालता है तथा यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रभावी नीतियों, सामाजिक स्वीकार्यता और सुदृढ़ संस्थागत ढांचे के बिना सतत विकास और गुणवत्तापूर्ण जीवन की कल्पना संभव नहीं है।

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Published

2025-12-31

How to Cite

मानसिक स्वास्थ्य: सम्प्रत्यय और भारतीय परिप्रेक्ष्य. (2025). International Journal of Science and Social Science Research, 3(3), 209-212. https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i3.508

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