शतरंज के खिलाड़ी और सवा सेर गेहूँ कहानी के सौ साल
DOI:
https://doi.org/10.63671/ijsssr.v3i4.525Keywords:
स्वाधीनता, आधिपत्य, विलासिता, जीवंतता, कर्तव्यच्युत, जागीरदार, सामंतीAbstract
शतरंज के खिलाड़ी’ और ‘सवा सेर गेहूँ’ दोनों मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख कहानी है। इन दोनों की रचना सन 1924 में हुई थी। प्रेमचंद की कहानियाँ आदर्श, यथार्थ तथा सामाजिक जागरुकता का संदेश देती हैं। दोनों कहानियां सौ साल पूरे होने के बाद आज भी प्रासंगिक हैं। जिस उदेश्य से प्रेमचंद ने इन कहानियों की रचना की थी शायद उन समस्याओं, अंधविश्वासों और सामाजिक कुरूपताओं से आज भी समाज निकल नहीं पाया है। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ कहानी अंग्रेजी शासन तथा स्वाधीनता आंदोलन के समय भारतीय समाज की स्थिति को प्रकट करती है। प्रेमचंद अपने दो पात्रों के माध्यम से भारतीय समाज की कायरता,विलासिता तथा कर्तव्यच्युत हो जाने की दशा को बखूबी दिखाने का प्रयास करते हैं। आज भी समाज बेरोजगारी, हत्या, बलात्कार,गरीबी से जूझ रहा है। सामंती मानसिकता समाज में व्याप्त है परंतु इसके खिलाफ वाला सत्ता का एक बड़ा हिस्सा मौन है। समाज में राजनीतिक रोटी सेंकने और चापलूसी करने वालों की तादात ज्यादा है। ‘सवा सेर गेहूँ’ कहानी किसानों पर होने वाले शोषण को बयां करती है। कहानी में शंकर नाम का एक कुर्मी किसान है जो एक अतिथि साधु के आतिथ्य सत्कार के लिए अपने गाँव के एक ब्राम्हण से सवा सेर गेहूँ उधार मांग लेता है। गेहूँ लौटाना भूल जाते हैं, कुछ वर्षों के बाद विप्र महराज याद दिलाते हैं। और सूद समेत सवा सेर गेहूँ का हर्जाना विप्र महाराज की कुटिलता से इतना बड़ा हो जाता है कि वह किसान भरते भरते मर जाता है लेकिन भर नहीं पाता। बाद में शंकर के बेटे को भी उसी ऋण को भरने के लिये महराज पकड़ लेते हैं। कहानी की प्रासंगिकता इस बात में है कि आज भी किसानों का शोषण कम नहीं हो रहा है बस शोषण के माध्यम बदल गए हैं।
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